बस्तर संभाग

कोरोना के कारण दो साल बाद कुम्हारों के कारोबार में आई रौनक...

कांकेर/बस्तर मित्र

आधुनिकता के दौर में आज भी मिट्टी के दीए के महत्व को जो जानते हैं लोग उनके बिना दीपावली की पूजा को अधूरा मानते हैं। कोरोना काल के 2 साल में कुम्हारों को बेहद परेशानी उठानी पड़ी। परंतु इस वर्ष उनको विश्वास है, कि इस बार जो मांग है, उससे स्थिति ठीक रहेगी। दीपावली पर्व जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहा है। वैसे ही कांकेर शहर के आसपास गांव में रहने वाले कुम्हार मिट्टी के दिए और मिट्टी का कलश बनाने में जुट गए हैं।

कांकेर शहर से लगे ग्राम पंडरीपानी के कुम्हार संतु राम चक्रधारी, बीरबल चक्रधारी, भावसिंह चक्रधारी, बंशुराम चक्रधारी, सीताराम चक्रधारी, जितेंद्र चक्रधारी व बरातू राम चक्रधारी ने बताया कि दिपावली पर्व में बाजारों में दिये और कलशा की बिक्री करने के लिए हम दशहरा से ही दिए और कलशा बनाने के लिए जुड़ जाते हैं। पिछले साल कोरोना के कारण लगभग 5000 हजार रुपये की ही बिक्री हो पाई थी। वैसे प्रतिवर्ष हमें 12000 हजार रुपये के दिये और कलशा बनाकर बाजारों में बिक्री करते थे, इस साल बाजार ठीक.-ठाक है।

इसलिए हम लोग ज्यादा दिए बना रहे हैं, कुम्हारों ने बताया कि मिट्टी के दिए और कलशा बनाने के लिए मिट्टी खरीदनी पड़ती है इसके साथ ही उसे पकाने के लिए लकड़ी भी खरीदनी पड़ती है, जिसके बाद उसे काफी मेहनत के साथ तैयार करनी होती है। जिसमें हमें काफी मेहनत लगती है, ऐसे में अगर हमारे दिये बाजारों में नहीं बिकते हैं तो हमें काफी नुकसान उठाना पड़ता है ।जिससे हमें घर चलाने में काफी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि हमारे पास इसके अलावा और कोई दूसरा व्यवसाय नहीं है, सरकार ने हम लोगों के बारे में ऐसी योजना नहीं बनाया है, जिससे हमारे व्यवसाय में वृद्धि हो सके।




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